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नई दिल्ली: आज देश भर में इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे बड़ा और पवित्र त्योहार ईद-उल-अजहा (बकरीद) पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. सुबह से ही देश की तमाम ऐतिहासिक मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज़ियों की भारी भीड़ देखी गई जहां लोगों ने नए और साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर सामूहिक रूप से दो रकात विशेष नमाज अदा की.
नमाज के मुकम्मल होने के बाद मुल्क में अमन, चैन, तरक्की और आपसी भाईचारे की खास दुआएं मांगी गई. इस्लामिक कैलेंडर यानी हिजरी सन के आखिरी महीने 'जिल-हिज्जा' की 10 तारीख को मनाया जाने वाला यह पर्व मुख्य रूप से अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास, सर्वोच्च समर्पण और स्वार्थहीन त्याग का जीवंत संदेश देता है.
ईद-उल-अजहा का सीधा संबंध पैगंबर हजरत इब्राहिम और उनके सुपुत्र हजरत इस्माइल के जीवन की एक अग्निपरीक्षा से जुड़ा है. माना जाता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के सपने में आकर उनसे उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी थी. हजरत इब्राहिम के लिए बुढ़ापे में पैदा हुए उनके बेटे हजरत इस्माइल जान से भी ज्यादा अजीज थे लेकिन अल्लाह के हुक्म के आगे उन्होंने अपनी ममता को पीछे छोड़ दिया.
कैसे हुई शुरूआत
जब हजरत इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए पूरी तरह तैयार हो गए और जैसे ही उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर छुरी चलाई अल्लाह ने उनके इस अदम्य जज्बे और ईमानदारी को स्वीकार कर लिया. फरिश्ते जिब्रईल के जरिए ऐन वक्त पर हजरत इस्माइल की जगह एक भेड़ को रखदिया गया और बच्चा पूरी तरह सुरक्षित रहा. इसी ऐतिहासिक और रूहानी घटना की याद में दुनिया भर के मुसलमान हर साल हलाल जानवरों की कुर्बानी देते हैं, जिसे 'सुन्नत-ए-इब्राहिमी' कहा जाता है.
बकरीद के मौके पर दी जाने वाली कुर्बानी केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है बल्कि इसके पीछे एक गहरा सामाजिक और मानवीय संदेश छिपा है. कुर्बानी के गोश्त (मांस) को कोई भी व्यक्ति पूरी तरह अपने घर में जमा करके नहीं रख सकता. सामाजिक ताने-बाने और समरसता को मजबूत करने के लिए गोश्त को अनिवार्य रूप से तीन बराबर हिस्सों में विभाजित किया जाता है.
पहला हिस्सा: समाज के अत्यंत निर्धन, बेसहारा और जरूरतमंद लोगों के लिए सुरक्षित रखा जाता है.
दूसरा हिस्सा: अपने सगे-संबंधी, प्रिय मित्रों और आस-पड़ोस के लोगों में वितरित किया जाता है.
तीसरा हिस्सा: स्वयं के परिवार के उपभोग के लिए इस्तेमाल होता है.
यह पर्व मक्का में होने वाली वार्षिक हज यात्रा के सफल समापन का भी प्रतीक है. दुनिया भर से आए लाखों हाजी जब हज के तमाम नियम पूरे कर लेते हैं, तब इसी दिन अपनी इबादत मुकम्मल करते हैं. यह त्योहार इंसानों को अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर मानवता की सेवा करने की सीख देता है. नमाज और कुर्बानी के बाद लोग एक-दूसरे के गले मिलकर 'ईद मुबारक' कह रहे हैं और घरों में पारंपरिक पकवानों के साथ मेहमाननवाजी का दौर जारी है.