menu-icon
The Bharatvarsh News

युद्धविराम के बाद भी हुई एयरस्ट्राइक? ईरान पर हमलों को लेकर नई रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में युद्धविराम के बाद मध्य पूर्व में हुई कथित सैन्य गतिविधियों को लेकर कई बड़े दावे किए गए हैं. इन खुलासों ने क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और देशों के आपसी संबंधों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है.

Calendar Last Updated : 30 May 2026, 08:29 AM IST
Share:

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले दावे किए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने ईरान के खिलाफ ऐसे सैन्य कदम उठाए, जिनकी जानकारी अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई थी. बताया जा रहा है कि अमेरिका की मध्यस्थता में हुए युद्धविराम के कुछ ही दिनों बाद यूएई ने ईरान के भीतर कई अहम ठिकानों को निशाना बनाकर हवाई हमले किए. इन दावों ने क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है.

अमेरिकी अखबार ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के मुताबिक, यूएई द्वारा किए गए इन हमलों में ईरान के कई रणनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकाने शामिल थे. इनमें फारस की खाड़ी में स्थित लावन द्वीप की तेल रिफाइनरी, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास मौजूद केश्म और अबू मूसा द्वीप, बंदरगाह शहर बंदर अब्बास और ईरान का बड़ा असालुयेह पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स शामिल बताए गए हैं.

ऊर्जा केंद्रों पर हमलों से बढ़ी चिंता

रिपोर्ट में कहा गया है कि असालुयेह पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स पर हुए हमले ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी थी. यह इलाका ईरान की ऊर्जा व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसे में वहां किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई का असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ सकता है. बताया जा रहा है कि स्थिति को गंभीर होते देख अमेरिका ने इजरायल पर दबाव बनाया था कि वह ईरान के ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाने वाले हमलों को सीमित करे. अमेरिका की चिंता थी कि यदि ऐसे हमले जारी रहे तो पूरे क्षेत्र में बड़ा संघर्ष भड़क सकता है.

अमेरिका और इजरायल के साथ हुआ समन्वय

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि यूएई ने इस सैन्य अभियान को अंजाम देने से पहले अमेरिका और इजरायल के साथ करीबी तालमेल बनाया था. सबसे अहम बात यह बताई गई है कि युद्धविराम की घोषणा के बाद भी यह अभियान कुछ समय तक जारी रहा. जहां खाड़ी क्षेत्र के कई देशों ने ईरान के साथ सीधे टकराव से दूरी बनाए रखी, वहीं यूएई ने अपेक्षाकृत अधिक आक्रामक रुख अपनाया. रिपोर्ट के अनुसार, अन्य देशों ने अपने हवाई क्षेत्र और सैन्य संसाधनों को इस संघर्ष से दूर रखने की कोशिश की, लेकिन यूएई ने अलग रणनीति चुनी.

सऊदी अरब और यूएई के बीच मतभेद की चर्चा

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि संघर्ष के शुरुआती चरण में यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद सऊदी अरब के रुख से संतुष्ट नहीं थे. दावा किया गया है कि सऊदी अरब ने ईरान विरोधी अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया था, जिससे दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर सामने आया. बाद में सऊदी अरब ने अमेरिका के समक्ष यह चिंता भी जताई कि यूएई की सैन्य कार्रवाई से खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा ठिकानों पर ईरान के जवाबी हमलों का खतरा बढ़ सकता है. इसी वजह से रियाद ने वाशिंगटन से इस तरह की समन्वित सैन्य गतिविधियों को रोकने का आग्रह किया था.

ईरान के हमलों से पहले भी झेल चुका है नुकसान

रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले ईरान ने भी यूएई को निशाना बनाया था. दावा किया गया है कि ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन के जरिए बड़े पैमाने पर हमले किए थे. इन हमलों से यूएई को आर्थिक और सुरक्षा के स्तर पर नुकसान उठाना पड़ा था. बताया गया है कि संघर्ष के दौरान हजारों मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया. हालांकि यूएई के पास अमेरिकी ‘थाड’ और ‘पैट्रियट’ जैसी आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियां मौजूद थीं, फिर भी कुछ हमले उसके सुरक्षा तंत्र को चुनौती देने में सफल रहे.

मध्य पूर्व पहले से ही कई भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे में इस तरह के दावे सामने आने के बाद क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर एक बार फिर ध्यान केंद्रित हो गया है. यदि रिपोर्ट में किए गए दावे सही साबित होते हैं, तो यह खाड़ी क्षेत्र की राजनीति और सैन्य समीकरणों को नए सिरे से प्रभावित कर सकता है. फिलहाल इस मामले को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर बनी हुई है और आने वाले दिनों में इससे जुड़े और खुलासे सामने आने की संभावना जताई जा रही है.

सम्बंधित खबर

Recent News