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मॉस्को: यूक्रेन पर रूस के हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. मंगलवार सुबह एक बार फिर उत्तर-पूर्वी यूक्रेन के खार्किव क्षेत्र में रूसी हमलों ने तबाही मचा दी. इस हमले में एक 22 वर्षीय युवती समेत चार लोगों की जान चली गई, जबकि कई अन्य लोग घायल हो गए. खार्किव क्षेत्र के गवर्नर ओलेग सिनेगुबोव ने जानकारी देते हुए बताया कि रूसी सेना ने सुबह के समय चुगुइव शहर पर हमला किया. गवर्नर के मुताबिक, इस हमले में चार नागरिकों की मौत हुई है.
हमले का सबसे ज्यादा असर रिहायशी क्षेत्रों में देखने को मिला. कई बहुमंजिला इमारतें क्षतिग्रस्त हो गईं और आसपास खड़े वाहन भी इसकी चपेट में आ गए. शुरुआती जानकारी के अनुसार कम से कम 18 वाहन पूरी तरह नष्ट हो गए हैं. स्थानीय प्रशासन का कहना है कि कई इमारतों की खिड़कियां और दीवारें क्षतिग्रस्त हुई हैं. कुछ मकानों में आग लगने के कारण लोगों को तुरंत बाहर निकालना पड़ा.राहत और बचाव दलों ने मौके पर पहुंचकर आग बुझाने और लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का काम शुरू किया.
खार्किव के मेयर इगोर तेरेखोव ने बताया कि हमले में 10 लोग घायल हुए हैं. घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है. अधिकारियों के अनुसार कुछ लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही है. डॉक्टरों की टीम लगातार घायलों की निगरानी कर रही है. प्रशासन ने लोगों से सतर्क रहने और सुरक्षा निर्देशों का पालन करने की अपील की है.
पिछले कुछ महीनों में यूक्रेन के कई शहरों और कस्बों पर रूस के हमलों में बढ़ोतरी देखी गई है. खासकर रिहायशी इलाकों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है. युद्ध की शुरुआत के बाद से आम नागरिकों पर पड़ने वाला असर लगातार गंभीर होता गया है. कई परिवार अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जबकि हजारों लोग अब भी संघर्ष वाले क्षेत्रों में रह रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी आंकड़े इस युद्ध की भयावह तस्वीर पेश करते हैं. अप्रैल में जारी एक अनुमान के मुताबिक, फरवरी 2022 में रूस द्वारा सैन्य अभियान शुरू किए जाने के बाद से यूक्रेन के विभिन्न क्षेत्रों में कम से कम 15,850 नागरिकों की मौत हो चुकी है. इसके अलावा, रूस के नियंत्रण वाले इलाकों में भी 2,800 से अधिक नागरिकों के मारे जाने की जानकारी सामने आई है. वहीं युद्ध से प्रभावित क्षेत्रों में 44,800 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि तीन साल से अधिक समय से जारी इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ा है.