मुंबई: दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे मरीजों के लिए अहम फैसला सुनाया था. जिसमें कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रहे हरिश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी थी. अब एक बार फिर से ये बहस तेज हो गई है. मुंबई से हरिश राणा जैसा ही एक केस सामने आ रहा है.
मुंबई में 35 वर्षीय आनंद दीक्षित की हालत ने उस सवाल को फिर जिंदा कर दिया है, जब शरीर सांस ले रहा हो लेकिन जीवन ठहर गया हो, तब परिवार के सामने सही रास्ता क्या होता है? यह कहानी सिर्फ एक मरीज की नहीं, बल्कि उम्मीद, दर्द और संघर्ष की भी है.
आनंद पिछले ढाई साल से कोमा जैसी स्थिति में हैं. यह भयावह घटना 2023 की एक धुंध भरी सर्दी की रात गोरखपुर में शुरू हुई. 29 दिसंबर, 2023 को आनंद उसी दिन खरीदे गए अपने बिल्कुल नए स्कूटर पर सवार था. लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस स्कूटर पर वह पहली बार चढ़ रहे हैं वह उनके जीवन की आखिरी सवारी होगी.
इस सड़क दुर्घटना के बाद उनकी हालत गंभीर हो गई थी. तब से वह लाइफ सेविंग इक्विपमेंट पर निर्भर हैं, ट्यूब के जरिए खाना दिया जाता है और मशीनों की मदद से सांस चल रही है. उनकी स्थिति ने पहले के चर्चित हरिश राणा मामले की याद दिला दी है, जिसमें लंबे संघर्ष के बाद इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई थी.
आनंद की देखभाल करने वाले उसके परिजन और दोस्त पिछले कई महीनों से आनंद की किसी एक मूव का इंतजार कर रहे हैं, एक हल्की हरकत, एक शब्द या आंखों की झपक तक नहीं. यह ऐसी स्थिति है जहां शरीर मौजूद है, लेकिन जीवन जैसे थम गया है.
जहां कुछ मामलों में परिवार कठिन निर्णय लेते हैं, वहीं आनंद का परिवार किसी भी कीमत पर उम्मीद नहीं छोड़ना चाहता. आनंद के माता-पिता आज भी किसी चमत्कार का इंतजार कर रहे हैं. वह इसी उम्मीद में हैं कि शायद एक दिन उनका बेटा ठीक हो जाएगा.