Courtesy: pinterest/@primmart
नई दिल्ली: अमेरिका के एक संघीय जज ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर की भारी फीस को रद्द कर दिया है. बोस्टन के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट जज लियो सोरोकिन ने सोमवार को यह बड़ा फैसला सुनाया. इस फैसले से भारतीय पेशेवरों को अमेरिका में नौकरी पाने का रास्ता आसान हो सकता है.
20 अमेरिकी राज्यों के गठबंधन ने इस फीस बढ़ोतरी के खिलाफ कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. राज्यों का कहना था कि इतनी ज्यादा फीस से कंपनियों के लिए डॉक्टर, टीचर और दूसरे जरूरी क्षेत्रों में कुशल विदेशी कर्मचारियों को हायर करना मुश्किल हो जाएगा.
ट्रंप प्रशासन ने इसे अमेरिकी नौकरियों की रक्षा के लिए जरूरी बताया था, लेकिन जज ने इसे अस्वीकार कर दिया. जज सोरोकिन ने लिखा कि कार्यकारी शाखा ने कांग्रेस की मंजूरी के बिना H-1B पिटिशन पर टैक्स थोपने की कोशिश की, जो गैर-कानूनी है.
H-1B वीजा अमेरिका में उन कंपनियों के लिए है जो विशेष कौशल वाले काम के लिए अमेरिकी कामगार न मिलने पर विदेशी प्रोफेशनल्स को हायर कर सकें. टेक कंपनियां इस वीजा की सबसे ज्यादा यूज करती हैं.
लगभग 75 प्रतिशत H-1B वीजा भारतीयों को मिलते हैं. इससे पहले भी H-1B आवेदन पर हजारों डॉलर खर्च होते थे. नई 1 लाख डॉलर की फीस से कंपनियां हिचकिचा रही थी और कई भारतीय स्टूडेंट्स व प्रोफेशनल्स चिंतित थे.
यह फैसला भारतीय युवाओं और आईटी प्रोफेशनल्स के लिए राहत भरा है. अगर फीस लागू हो जाती तो अमेरिकी कंपनियां अतिरिक्त खर्च से बचने के लिए विदेशी टैलेंट को कम हायर करती. अब फीस रद्द होने से कंपनियां बिना अतिरिक्त बोझ के भारतीय इंजीनियरों, डॉक्टर्स, रिसर्चर्स और टीचर्स को आसानी से स्पॉन्सर कर सकेंगी.
इससे अमेरिका में भारतीयों की नौकरी के अवसर बढ़ सकते हैं. खासकर टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और रिसर्च क्षेत्र में मांग बनी रहेगी. मासाचुसेट्स अटॉर्नी जनरल ने कहा कि यह फैसला शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में जरूरी पदों को भरने में मदद करेगा.
यह फैसला H-1B प्रोग्राम की साख बचाता है और कुशल भारतीय युवाओं के सपनों को नया बल देता है. हालांकि, H-1B वीजा की कुल संख्या सीमित है और लॉटरी सिस्टम भी जारी रहेगा. फिर भी फीस हटने से प्रक्रिया सस्ती और आकर्षक जरूर हो गई है.