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कोलकाता: पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ बढ़ती कार्रवाई के बीच कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं. हिरासत केंद्रों और निर्वासन के डर से सीमा चौकियों पर लौट रहे बांग्लादेशी नागरिक अब बता रहे हैं कि वे किस तरह अवैध रूप से भारत में दाखिल हुए और यहां पहचान संबंधी दस्तावेज हासिल किए.
कुछ लोगों ने नदियां पार कर भारत पहुंचने की बात कही, जबकि कई ने बताया कि दलालों और बिचौलियों के संगठित नेटवर्क ने उन्हें सीमा पार कराने में मदद की. कई प्रवासियों ने दावा किया कि स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं की मदद से उन्हें वोटर कार्ड, राशन कार्ड और सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिला.
बांग्लादेश के कुश्तिया जिले के एक बढ़ई ने बताया कि उसने एक दलाल को 7,000 से 8,000 रुपये दिए थे. वह रात के समय बीएसएफ की गतिविधियों पर नजर रखता था और जैसे ही गश्त में थोड़ी ढील मिलती, लोगों को सीमा पार करा देता था.
एक अवैध बांग्लादेशी प्रवासी ने स्थानीय यूट्यूब चैनल को बताया, 'उनके पास पांच से छह लोगों की टीमें होती हैं. रात में, वे जाँच करते हैं कि किन इलाकों में बीएसएफ की मौजूदगी है और किनमें नहीं. जैसे ही उन्हें कोई खाली जगह मिलती है, वे लोगों को उस पार भेज देते हैं. यही उनकी व्यवस्था है.'
उसने आगे कहा, 'कभी-कभी आपको सीमा पार करने का मौका पाने के लिए पूरी रात इंतजार करना पड़ता है. कभी-कभी यह 10 मिनट के भीतर ही हो जाता है.'
बेंगलुरु में रह रहे एक अन्य अवैध बांग्लादेशी प्रवासी ने बताया, 'लोगों को सीमा पार कराने वाले व्यक्ति को 2,000 रुपये देकर, वह हमें बांग्लादेश से भारत ले जाता था, भले ही सीमा पर सेना मौजूद हो.'
उसने यह भी दावा किया कि आधार कार्ड बनवाने के लिए 2,000 से 3,000 रुपये खर्च किए गए और बाद में ट्रेन के जरिए वे बेंगलुरु पहुंचे.
कुछ प्रवासियों ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क ने उन्हें पहचान पत्र दिलाने में मदद की. एक प्रवासी ने कहा, 'मैंने अपना वोटर कार्ड और राशन कार्ड तब बनवाया था जब ममता की पार्टी सत्ता में थी. पार्टी के लोगों ने मुझे दस्तावेज बनवाने में मदद की. मुझे दो से तीन साल तक लक्ष्मी भंडार की सहायता भी मिली.'
एक अन्य व्यक्ति ने कहा, 'तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में किसी ने कुछ नहीं कहा. अब सरकार बदल गई है. अब लोग हमारे पीछे पड़े हैं.'
उसने यह भी स्वीकार किया कि उसने भारत में वोट डाला था और उसकी पत्नी को लक्ष्मी भंडार योजना के तहत आर्थिक सहायता मिली थी.
पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में हाल के सप्ताहों में निगरानी और जांच तेज कर दी गई है. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा है कि अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को सीधे बीएसएफ को सौंपा जाना चाहिए.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा कि जो घुसपैठिए स्वेच्छा से लौट रहे हैं, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी.
सीमा पर लौट रहे कई बांग्लादेशियों ने बताया कि वे वर्षों से भारत में रहकर बढ़ई, राजमिस्त्री और घरेलू कामगार के रूप में काम कर रहे थे.
खुलना जिले के सलाम डाली ने बताया कि वह पांच साल पहले 8,000 से 10,000 रुपये देकर भारत आया था और बढ़ई का काम करता था.
एक अन्य प्रवासी ने कहा, 'मेरे माता-पिता मुझे बचपन में इस देश में लाए थे. पिताजी बढ़ई का काम करते थे. किसी ने कुछ नहीं कहा. हम बस खाते-पीते और काम करते थे.'
भारत-बांग्लादेश सीमा की कुल लंबाई 4,096 किलोमीटर से अधिक है, जिसमें नदी क्षेत्र, कृषि भूमि और घनी आबादी वाले इलाके शामिल हैं. सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से मानव तस्करी और अवैध नेटवर्क को लेकर चिंता जताती रही हैं.
गृह मंत्रालय के अनुसार, फरवरी 2025 तक भारत-बांग्लादेश सीमा के लगभग 79 प्रतिशत हिस्से पर बाड़ लगाई जा चुकी है.