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नॉर्वे अखबार में सांप पकड़ते PM मोदी का कार्टून देख भारतीयों का खून खौला, विदेश मंत्रालय ने लगाई फटकार

नॉर्वे के प्रमुख अखबार आफ्टेनपोस्टेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सपेरे के रूप में दिखाते हुए नस्लवादी कार्टून प्रकाशित किया, जिसमें उन्हें सांप वाले पेट्रोल पंप का पाइप पकड़ते हुए दर्शाया गया.

Calendar Last Updated : 20 May 2026, 09:16 AM IST
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नई दिल्ली: नॉर्वे के प्रमुख दैनिक अखबार आफ्टेनपोस्टेन (Aftenposten) भारी विवाद में फंस गया है. अखबार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सपेरे के रूप में दिखाते हुए एक कार्टून प्रकाशित किया, जिसमें उन्हें सांप के आकार वाले पेट्रोल पंप के पाइप को पकड़े हुए दर्शाया गया. इस कार्टून को नस्लवादी और पुरानी औपनिवेशिक सोच का प्रतीक बताते हुए व्यापक आलोचना हो रही है.

विवाद की शुरुआत

यह घटना प्रधानमंत्री मोदी की नॉर्वे की राजकीय यात्रा के दौरान हुई. एक नॉर्वेजियन पत्रकार हेगे लिंग ने संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग में भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर सवाल उठाया.

प्रधानमंत्री मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री के जवाब दिए बिना निकल जाने के बाद यह मामला और गरमा गया. इसी बीच अखबार ने विवादित कार्टून और एक संपादकीय प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक “एक चतुर और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी” था.

सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया

कार्टून सामने आते ही सोशल मीडिया पर भारी आक्रोश फैल गया. कई यूजर्स ने इसे घोर नस्लवादी बताया. लोगों का कहना है कि यह कार्टून भारत को “सांपों वाले देश” के पुराने पश्चिमी रूढ़िवादी चित्रण को दोहराता है. एक यूजर ने लिखा, “यह खुलेआम नस्लवाद है.” दूसरे यूजर्स ने कहा कि यूरोपीय मीडिया अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है. 

प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में अमेरिका में दिए अपने भाषण में इस बात का जिक्र किया था कि पहले भारत को विदेश में सपेरों का देश माना जाता था, लेकिन अब यह प्रौद्योगिकी का देश बन गया है.

भारत का मजबूत जवाब

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी. विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज ने भारत के लोकतंत्र, संवैधानिक मूल्यों और मीडिया की स्वतंत्रता का मजबूत बचाव किया. उन्होंने कहा कि भारत में सैकड़ों टीवी चैनल हैं और देश की विशालता को समझे बिना कुछ चुनिंदा रिपोर्टों के आधार पर आलोचना करना उचित नहीं है.

पहले भी हो चुकी ऐसी घटनाएं

यह पहली बार नहीं है जब भारतीय प्रधानमंत्री या भारत को ऐसे नस्लवादी चित्रण से जोड़ा गया हो. वर्ष 2022 में स्पेन के एक अखबार ने भी इसी तरह के प्रतीक का इस्तेमाल किया था, जिसकी काफी आलोचना हुई थी. ऐसे कार्टून न सिर्फ भारत और उसके नेतृत्व का अपमान करते हैं बल्कि पश्चिमी मीडिया में बची हुई पूर्वाग्रहों को भी उजागर करते हैं.

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