पटना: बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी नजर आ रही है. सत्ता और रणनीति के बीच संतुलन साधने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब एक नए राजनीतिक अध्याय की ओर बढ़ते दिख रहे हैं. पिछले कुछ दिनों से उनके इस्तीफे की संभावना जताई जा रही है. इस खबर ने न सिर्फ सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है, बल्कि गठबंधन राजनीति और जेडीयू के भविष्य को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए है.
सूत्रों के अनुसार, नीतीश कुमार 30 मार्च को बिहार विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे सकते हैं. यह कदम उनके हालिया राज्यसभा चुनाव के बाद उठाया जा रहा है. माना जा रहा है कि इस निर्णय से उनके मुख्यमंत्री पद छोड़ने का रास्ता भी साफ हो सकता है, जिससे वे राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना कार्यकाल शुरू कर सकें.
नीतीश कुमार के इस फैसले को एक बड़े राजनीतिक पुनर्गठन के रूप में देखा जा रहा है. राज्यसभा में जाने के बाद उनका फोकस राष्ट्रीय राजनीति पर ज्यादा हो सकता है. हालांकि, इससे राज्य की सत्ता में उनकी सीधी भूमिका कम हो जाएगी.
जेडीयू के कई नेता और कार्यकर्ता इस फैसले से सहमत नहीं बताए जा रहे हैं. क्योंकि एक विधायक ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि 'वह ऐसा कर रहे हैं. सभी यही चाहते थे (कि वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न दें), लेकिन वह सहमत नहीं हुए.'
पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़ना संगठन के लिए नुकसानदायक हो सकता है. इसके बावजूद, संकेत हैं कि उन्होंने अपना फैसला लगभग तय कर लिया है.
विपक्ष, खासकर आरजेडी, इस घटनाक्रम को लेकर लगातार सवाल उठा रही है. तेजस्वी यादव ने दावा किया है कि नीतीश कुमार को राज्यसभा जाने के लिए मजबूर किया गया है और यह कदम भाजपा की रणनीति का हिस्सा हो सकता है. उनके अनुसार, इससे जेडीयू की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान कमजोर पड़ सकती है.
नीतीश कुमार ने इस साल 5 मार्च को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के अपने फैसले की घोषणा की थी , साथ ही उन्होंने बिहार विधानसभा के दोनों सदनों और संसद के दोनों सदनों के सदस्य बनने की अपनी लंबे समय से चली आ रही इच्छा को भी व्यक्त किया था.