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बिहार में शराबबंदी को लेकर जीतन राम मांझी ने उठाई गुजरात मॉडल लागू करने की मांग

जीतन राम मांझी ने बिहार की शराबबंदी व्यवस्था की समीक्षा कर विशेष परिस्थितियों में परमिट के जरिए शराब की अनुमति देने पर विचार करने की मांग की. उन्होंने गुजरात मॉडल का उदाहरण देते हुए कानून के बेहतर अमल की जरूरत बताई.

Calendar Last Updated : 09 August 2026, 07:10 PM IST
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पटना: बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है. हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) की युवा इकाई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी प्रमुख जीतन राम मांझी ने राज्य की मौजूदा शराबबंदी व्यवस्था में बदलाव की जरूरत बताई. उन्होंने कहा कि शराबबंदी का कानून अपनी जगह सही है, लेकिन इसके अमल में कुछ स्तरों पर दिक्कतें सामने आ रही हैं. 

बिहार सरकार ने की समीक्षा 

मांझी ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और बिहार सरकार से इस व्यवस्था की समीक्षा करने की अपील की. उन्होंने गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां शराबबंदी लागू होने के बावजूद कुछ विशेष परिस्थितियों में परमिट और तय नियमों के तहत शराब की अनुमति दी जाती है. उनका सुझाव है कि बिहार में भी इसी तरह की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है. 

लंबे समय से बदलाव की पैरवी

जीतन राम मांझी इससे पहले भी बिहार में शराबबंदी के मौजूदा स्वरूप में बदलाव की मांग कर चुके हैं. वर्ष 2022 में उन्होंने गुजरात के परमिट मॉडल को बिहार में लागू करने की बात कही थी. इसके बाद 2023 में गुजरात के GIFT City में शराब सेवन को लेकर सीमित छूट दिए जाने के बाद भी उन्होंने बिहार में ऐसी व्यवस्था की वकालत की थी.

मांझी का तर्क रहा है कि पूरी तरह सख्त शराबबंदी से अवैध शराब के कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है. उनका कहना है कि इसका सबसे ज्यादा असर समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ता है और कई मामलों में कानून का इस्तेमाल गरीब लोगों के खिलाफ अधिक होता है. हालांकि, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहले ही शराबबंदी में किसी तरह की छूट देने से इनकार कर चुके हैं. अप्रैल 2026 में मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद उन्होंने स्पष्ट किया था कि बिहार में शराबबंदी जारी रहेगी. साथ ही उन्होंने अवैध और जहरीली शराब के कारोबार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही थी.

NCAER की रिपोर्ट ने बढ़ाई बहस

इस बीच नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) के एक शोध ने भी शराबबंदी को लेकर बहस को नया आधार दिया है. रिपोर्ट में नीति के सामाजिक प्रभावों, अवैध शराब और अन्य नशीले पदार्थों के इस्तेमाल जैसे पहलुओं पर सवाल उठाए गए हैं. इसमें शराबबंदी हटने की स्थिति में संभावित राजस्व लाभ और सरकारी खर्च में कमी की संभावना पर भी चर्चा की गई है.

ऐसे में बिहार में शराबबंदी अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं रह गई है. इसके साथ कानून-व्यवस्था, अवैध कारोबार और राज्य की अर्थव्यवस्था जैसे सवाल भी जुड़ गए हैं. एक ओर मांझी गुजरात मॉडल की तर्ज पर बदलाव चाहते हैं, जबकि सरकार फिलहाल पूर्ण शराबबंदी जारी रखने के पक्ष में है.

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