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नेपाल को फिर हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग तेज, देउबा के बयान से गरमाई सियासत

देश के राजनीतिक परिदृश्य में नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग लंबे समय बाद इतने आक्रामक रूप में सामने आई है। बहस को पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने नया मोड़ दिया है।

Calendar Last Updated : 22 August 2026, 03:28 PM IST
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नई दिल्ली: नेपाल में धर्मनिरपेक्षता और देश की सांस्कृतिक पहचान को लेकर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। देश के राजनीतिक परिदृश्य में नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग लंबे समय बाद इतने आक्रामक रूप में सामने आई है। इस बहस को नया मोड़ नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के रुख ने दिया है, जिन्होंने सनातन धर्म को नेपाल की मूल राष्ट्रीय पहचान के रूप में स्थापित करने की बात कही है। नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने का यह आंदोलन अब महज नारों तक सीमित न रहकर कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं की ओर बढ़ रहा है।

संवैधानिक संशोधन की राह 

नेपाली कांग्रेस के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान देउबा गुट ने सनातन परंपरा को देश की सांस्कृतिक रीढ़ के रूप में स्वीकारने का औपचारिक प्रस्ताव पारित किया। इस दौरान 'मैं हिंदू हूं' के नारों से पूरा सम्मेलन परिसर गूंज उठा। 
इस प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया है कि सनातन पहचान की यह मांग किसी अन्य संप्रदाय की उपेक्षा नहीं करती। इसमें बौद्ध, किरात और प्रकृति-पूजक परंपराओं को सहेजते हुए सभी धार्मिक समुदायों के लिए समान स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने का वादा किया गया है।

राजनीतिक हलचल

नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने का यह आंदोलन अब महज नारों तक सीमित न रहकर कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं की ओर बढ़ रहा है। वर्ष 2015 में लागू किए गए संविधान के तहत नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष संघीय गणराज्य घोषित किया गया था, लेकिन अब इस व्यवस्था को बदलने की कवायद शुरू हो चुकी है। वर्तमान में बालेन शाह सरकार द्वारा गठित संविधान संशोधन कार्य-समूह देश के कुल 308 अनुच्छेदों में से 245 में बदलाव के सुझावों पर काम कर रहा है। हिंदूवादी संगठनों के लिए यह प्रक्रिया अपनी मांगों को उठाने का एक बड़ा मौका बन गई है। विश्व हिंदू परिषद नेपाल ने सरकार को बाकायदा एक लिखित प्रस्ताव सौंपकर संविधान के अनुच्छेद 4 से 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द को पूरी तरह हटाने की मांग की है।

क्या फैसला लेंगे बालेन शाह?

इस आंदोलन में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP) सबसे आगे खड़ी दिखाई दे रही है। पार्टी अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद लिंगदेन के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में प्रधानमंत्री बालेन शाह से मुलाकात कर मांग की कि आगामी व्यापक संविधान संशोधन के दौरान धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे पर संसद में खुली बहस कराई जाए। RPP का मानना है कि देश की बहुसंख्यक जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस ऐतिहासिक भूल को सुधारा जाना चाहिए। एक तरफ जहां दक्षिणपंथी दल इस मुद्दे पर आक्रामक रणनीति बना रहे हैं, वहीं बालेन शाह सरकार के सामने देश में सामाजिक संतुलन बनाए रखते हुए इन संशोधनों पर आम सहमति बनाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। नेपाल का राजनीतिक भविष्य अब इसी बहस के इर्द-गिर्द घूमता दिख रहा है।

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