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नई दिल्ली: पाकिस्तान इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां एक तरफ आर्थिक संकट, बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, तो दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में ताकत की लड़ाई तेज होती दिखाई दे रही है. रिपोर्टों के मुताबिक, सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है और अब पाकिस्तान के राजनीतिक सिस्टम में बड़े बदलाव की चर्चा शुरू हो गई है. ऐसे में देश के संविधान और शासन व्यवस्था को लेकर भी कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं.
पाकिस्तान में सेना का राजनीतिक दखल कोई नई बात नहीं है. लेकिन मौजूदा हालात में सैन्य प्रभाव को और मजबूत करने की कोशिशों की चर्चा ने नई बहस छेड़ दी है. रिपोर्टों के अनुसार, संसदीय व्यवस्था की जगह राष्ट्रपति प्रणाली को ज्यादा ताकत देने का प्रस्ताव सामने आ सकता है. इसके जरिए राष्ट्रपति पद को अधिक अधिकार देने और सरकार के फैसलों में सेना की भूमिका बढ़ाने की कोशिश की जा सकती है. इसके साथ ही नए प्रांतों और प्रशासनिक इकाइयों के गठन की संभावना भी जताई जा रही है. संसाधनों के बंटवारे और केंद्र तथा प्रांतों के बीच अधिकारों को लेकर भी बदलाव की चर्चा है. बताया जा रहा है कि इन बदलावों के साथ लंबे समय के लिए नया आर्थिक रोडमैप तैयार करने की योजना पर भी विचार किया जा सकता है.
पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रहा है. देश पर विदेशी कर्ज का दबाव है और कई इलाकों में सरकार तथा सेना के खिलाफ असंतोष भी देखने को मिलता रहा है. बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जैसे क्षेत्रों में विरोध की आवाजें लगातार उठती रही हैं. दूसरी ओर, राजनीतिक सत्ता पर सेना का प्रभाव बढ़ने की चर्चाओं ने सवाल खड़े कर दिए हैं. आलोचकों का कहना है कि राजनीतिक दलों की नाकामी को आधार बनाकर सैन्य प्रतिष्ठान अपने लिए ज्यादा अधिकार हासिल करने की कोशिश कर सकता है.
पाकिस्तान के इतिहास में सेना का सत्ता पर कब्जा कोई अनोखी घटना नहीं रही है. परवेज मुशर्रफ के दौर में भी संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सेना का प्रभाव साफ दिखाई दिया था. अब असीम मुनीर को लेकर भी इसी तरह की आशंकाएं जताई जा रही हैं. शरीफ और भुट्टो-जरदारी जैसे राजनीतिक परिवारों पर भ्रष्टाचार और शासन में नाकामी के आरोप लगते रहे हैं. इसी बीच सेना की मजबूत होती भूमिका यह संकेत देती है कि पाकिस्तान में वास्तविक सत्ता का संतुलन एक बार फिर बदल सकता है.
अगर संविधान में प्रस्तावित बदलावों के तहत राष्ट्रपति पद को ज्यादा अधिकार मिलते हैं और नए प्रांत बनाए जाते हैं, तो इससे पाकिस्तान का प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचा काफी बदल सकता है. इसका सीधा असर केंद्र, प्रांतों और सेना के बीच शक्ति संतुलन पर पड़ेगा.