menu-icon
The Bharatvarsh News

होर्मुज स्ट्रेट पर UNSC में हाई-वोल्टेज ड्रामा, बहरीन के इस प्रस्ताव पर रूस-चीन का 'वीटो'; फ्रांस ने भी दिया साथ

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को खुला रखने का प्रस्ताव रूस और चीन के वीटो के कारण गिर गया है. इस कूटनीतिक गतिरोध से वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट बढ़ गया है.

Calendar Last Updated : 03 April 2026, 07:36 PM IST
Share:

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में चल रहा कूटनीतिक नाटक अब एक नए और गंभीर मोड़ पर आ गया है. बहरीन की अगुवाई में खाड़ी देशों ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किया था जिसका मुख्य उद्देश्य रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को हर हाल में स्वतंत्र रखना था. हालांकि ईरान के करीबी सहयोगियों द्वारा वीटो पावर का इस्तेमाल किए जाने के बाद यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया है. इस विफलता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा और ऊर्जा संकट की चिंताओं को और अधिक गहरा कर दिया है.

बहरीन ने सुरक्षा परिषद में यह मांग उठाई थी कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के समुद्री रास्ते को पूरी तरह सुचारू रखने के लिए 'सभी आवश्यक तरीकों' का उपयोग करने की अंतरराष्ट्रीय अनुमति प्रदान की जाए. इसका स्पष्ट संकेत यह था कि यदि ईरान इस मार्ग में कोई बाधा उत्पन्न करता है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सैन्य कार्रवाई करने का अधिकार होगा. खाड़ी देशों के लिए यह मार्ग उनके आर्थिक अस्तित्व से जुड़ा है. क्योंकि विश्व की तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है.

रूस और चीन का कड़ा रुख

सुरक्षा परिषद के भीतर इस प्रस्ताव के मसौदे में कई बार बदलाव किए गए. लेकिन मुख्य विवाद 'बल प्रयोग' की भाषा को लेकर बना रहा. ईरान के रणनीतिक मित्र माने जाने वाले रूस और चीन ने अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल करते हुए इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया. उन्होंने तर्क दिया कि बल प्रयोग की अनुमति देने वाले किसी भी कदम से इलाके में तनाव कम होने के बजाय और अधिक बढ़ सकता है. उन्होंने सैन्य समाधान के बजाय बातचीत और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया.

फ्रांस की कूटनीति और असहमति 

इस पूरे घटनाक्रम में फ्रांस की भूमिका ने वैश्विक पर्यवेक्षकों को थोड़ा हैरान किया. हालांकि फ्रांस ने वीटो का उपयोग नहीं किया, लेकिन वह सैन्य कार्रवाई के पक्ष में भी खड़ा नहीं दिखा. पेरिस ने सैन्य हस्तक्षेप के बजाय कूटनीतिक रास्तों पर अधिक जोर दिया. फ्रांस का मानना था कि एक ऐसे गैर-वीटो प्रस्ताव का समर्थन किया जाना चाहिए जो शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने की बात करता हो. इस रुख ने प्रस्ताव को कूटनीतिक रूप से और अधिक कमजोर कर दिया.

मतदान से पहले ही अटका प्रस्ताव 

प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ती खींचतान और मतभेदों के कारण स्थिति यह बनी कि इस प्रस्ताव पर अंतिम मतदान की नौबत ही नहीं आ सकी. बहरीन और उसके सहयोगी देशों ने महसूस किया कि रूस और चीन के कड़े विरोध के बाद इस प्रस्ताव का पास होना असंभव है. परिणामस्वरूप महीनों की चर्चा के बाद तैयार किया गया यह मसौदा आखिरकार बीच में ही अटक गया. इस कूटनीतिक गतिरोध ने साबित कर दिया कि महाशक्तियों के बीच अविश्वास की खाई अभी भी बहुत गहरी है.

सम्बंधित खबर

Recent News