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नई दिल्ली: ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता को लेकर अब एक नया आर्थिक पहलू सामने आया है. युद्ध के दौरान दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता बनाने की कोशिश करने वाले पाकिस्तान ने अमेरिका से बड़ी आर्थिक मदद की मांग की है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए अमेरिका से 10 अरब डॉलर की करेंसी सपोर्ट फैसिलिटी मांगी है.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने ईरान-अमेरिका संघर्ष में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद अमेरिका के सामने यह प्रस्ताव रखा है. पाकिस्तानी अधिकारियों को उम्मीद है कि इस पहल से देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिलेगी और आर्थिक संकट से जूझ रही अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है.
सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान ने अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय विनिमय स्थिरीकरण सहायता सुविधा शुरू करने का अनुरोध किया है. यह व्यवस्था अधिकतम पांच साल की अवधि के लिए हो सकती है. इस तरह की सुविधा का मुख्य उद्देश्य किसी देश के विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा देना और उसकी मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव को कम करना होता है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से विदेशी मुद्रा की कमी, कमजोर मुद्रा और बढ़ते कर्ज जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है. ऐसे में अमेरिका से मिलने वाली संभावित सहायता उसके लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
अगर अमेरिका पाकिस्तान के इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है, तो इससे पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी हो सकती है. इसके साथ ही पाकिस्तानी रुपये पर दबाव कम करने में भी मदद मिल सकती है. पाकिस्तान का मानना है कि ऐसी आर्थिक सहायता से उसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मिलने वाली मदद पर अपनी निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी. हालांकि, देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ के साथ चल रहे कार्यक्रम के तहत आर्थिक सुधारों को जारी रखेगा.
फिलहाल पाकिस्तान 7 अरब डॉलर के आईएमएफ कार्यक्रम के तहत काम कर रहा है. इस कार्यक्रम के तहत उसे टैक्स बढ़ाने, सरकारी खर्च को नियंत्रित करने और आर्थिक सुधार लागू करने जैसे कई कठिन फैसले लेने पड़े हैं. इन फैसलों का आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ा है और सरकार को राजनीतिक स्तर पर भी इसका सामना करना पड़ा है.
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन फैसिलिटी सीमित देशों को ही उपलब्ध कराई जाती है. इसके तहत किसी देश को डॉलर, करेंसी स्वैप या अन्य तरह की वित्तीय गारंटी के माध्यम से सहायता दी जा सकती है. इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना और स्थानीय मुद्रा को स्थिर रखने में मदद करना होता है. यह सुविधा अमेरिकी फेडरल रिजर्व और कुछ बड़े केंद्रीय बैंकों के बीच होने वाले स्थायी डॉलर स्वैप समझौतों से अलग होती है. पाकिस्तान के लिए ऐसी सहायता मिलना आर्थिक मदद के साथ-साथ अमेरिका के साथ उसके संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत भी माना जा सकता है.
पाकिस्तान पहले भी गंभीर आर्थिक संकट के दौरान आईएमएफ की मदद ले चुका है. साल 2023 में उसे 3 अरब डॉलर का स्टैंडबाय पैकेज मिला था, जिससे संभावित डिफॉल्ट का खतरा टालने में मदद मिली. इसके बाद पाकिस्तान को 7 अरब डॉलर की एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी भी मिली. इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए उसे 1.3 अरब डॉलर का अलग कर्ज भी मिला. हालांकि, इसके बावजूद पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार अब भी काफी हद तक चीन और सऊदी अरब जैसे देशों से मिलने वाली वित्तीय सहायता, जमा राशि और कर्ज के रोलओवर पर निर्भर है.
पाकिस्तान की ओर से यह मांग ऐसे समय में सामने आई है, जब इस्लामाबाद अमेरिका के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. ईरान-अमेरिका संघर्ष में मध्यस्थता के प्रयासों के बाद पाकिस्तान को उम्मीद है कि उसकी कूटनीतिक भूमिका से उसे आर्थिक लाभ भी मिल सकता है. अगर अमेरिका 10 अरब डॉलर की इस सुविधा को मंजूरी देता है, तो पाकिस्तान को अपने विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है. साथ ही, यह उसके लिए आर्थिक सुरक्षा के साथ एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी होगा.
हालांकि, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार के संकेत जरूर दिखे हैं, लेकिन इसके लिए सरकार को टैक्स बढ़ाने, सरकारी खर्च घटाने और कई योजनाओं पर खर्च सीमित करने जैसे कठिन कदम उठाने पड़े हैं. ऐसे में अमेरिका से मांगी गई यह आर्थिक सहायता पाकिस्तान के लिए आने वाले समय में काफी अहम साबित हो सकती है.