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नई दिल्ली: आज की तेज रफ्तार जिंदगी में मोबाइल और स्क्रीन हमारे दिन भर की रुटीन का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन यही सुविधा अब धीरे-धीरे समस्या का रूप भी ले रही है. 'डिजिटल थकान' अब सिर्फ एक ट्रेंडिंग शब्द नहीं, बल्कि कई लोगों के रोजमर्रा के जीवन की सच्चाई बन गई है, जो उनकी नींद, ध्यान और मानसिक शांति को प्रभावित कर रही है.
मेंटल हेल्थ स्पेशलिस्ट ने बताया कि समस्या केवल ज्यादा स्क्रीन देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर हमारे पूरे जीवनशैली पर पड़ रहा है. अगर जल्द ही इसमें सुधार नहीं किया गया तो यह हमारे जीवन में काफी गहरा असर डाल सकता है. उनका मानना है कि समाधान तकनीक से दूरी बनाना नहीं, बल्कि उसका संतुलित और समझदारी से उपयोग करना है.
रात में मोबाइल चलाना भले ही आरामदायक लगे, लेकिन यह शरीर के लिए काफी नुकसानदायक हो सकता है. स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी शरीर में नींद लाने वाले हार्मोन मेलाटोनिन के बनने में मुश्किल पैदा करती है, जिससे दिमाग देर तक सक्रिय बना रहता है और इससे नींद प्रभावित होती है.
विशेषज्ञ ने सलाह दी है कि सोने से कम से कम 30 मिनट पहले स्क्रीन से दूरी बना लेनी चाहिए. यह छोटा सा बदलाव आपके दिमाग को शांत करने में मदद करता है और नींद की गुणवत्ता को बेहतर बनाता है. बिस्तर पर मोबाइल का इस्तेमाल आपकी स्लीप साइकल को बिगाड़ सकता है.
अपने घर में कुछ ऐसी जगह तय करें, जहां मोबाइल या अन्य डिवाइस का इस्तेमाल न हो. ये करना आपके सेहत के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है. खासकर बेडरूम को स्क्रीन-फ्री रखने से दिमाग उस जगह को आराम और नींद से जोड़ने लगता है, जिससे बेहतर आराम मिलता है.
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब पूरी तरह इंटरनेट से दूरी बनाना नहीं है, बल्कि इसका मतलब है उपयोग पर नियंत्रण रखना. अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना, स्क्रीन से ब्रेक लेना और समय-समय पर किताब पढ़ना, डायरी लिखना या टहलना जैसी गतिविधियां अपनाना इसमें मददगार हो सकती हैं.