रंगो के त्योहार होली के कई 'अतरंगी' नाम, जानें इसके पीछे की ABCD

होली भारत में एक जैसी खुशी बिखेरती है, लेकिन हर राज्य में इसका स्वाद अलग है. उत्तर प्रदेश से हरियाणा तक, पश्चिम बंगाल से महाराष्ट्र तक देशभर में इसे कई नामों से जाना जाता है.

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Courtesy: Pinterest

Lifestyle News: होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि भारत की अलग-अलग तरह की चीज़ों का जीता-जागता उदाहरण है. यह बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है, लेकिन हर इलाके ने इसे अपने कल्चर से सजाया है. कहीं लाठियां चलती हैं, कहीं फूल बरसाए जाते हैं, कहीं गाने गाए जाते हैं, कहीं मार्शल आर्ट दिखाए जाते हैं. नाम भी अलग-अलग रहे हैं जैसे लट्ठमार, फगुवा, डोल, शिग्मो. इस साल होलिका दहन 3 मार्च को और धुलंडी 4 मार्च को मनाई जाएगी. आज हम भारत के अलग-अलग हिस्सों में होली के इन अनोखे तरीकों को देखेंगे, जो दिखाते हैं कि कोई त्योहार कितना रंगीन हो सकता है.

ब्रज की लट्ठमार और फूलों की होली

उत्तर प्रदेश का ब्रज इलाका होली का सबसे रंगीन सेंटर है. बरसाना और नंदगांव में लट्ठमार होली मनाई जाती है, जिसमें औरतें मजाक में आदमियों पर लाठियों से हमला करती हैं, जबकि वे ढाल से अपना बचाव करते हैं. यह कृष्ण-राधा लीला से जुड़ी है. वृंदावन में फूल होली मनाई जाती है, जिसमें रंगों की जगह फूलों की पंखुड़ियां बरसाई जाती हैं. बरसाना के श्रीजी मंदिर में लड्डू होली भी खास होती है, जहां मिठाइयां फेंकी जाती हैं. यह परंपरा कृष्ण की शरारतों की यादें ताजा करती है और लाखों भक्तों को अपनी ओर खींचती है.

उत्तर भारत में धुलंडी और होला मोहल्ला

हरियाणा में होली को धुलंडी कहा जाता है, जहां ननद-भाभी के बीच मस्ती और उल्लास का माहौल होता है. पारिवारिक रिश्तों की मिठास बढ़ाने वाली यह परंपरा बहुत लोकप्रिय है. पंजाब में सिख समुदाय होला मोहल्ला मनाता है, जिसमें तलवारबाज़ी, घुड़सवारी और मार्शल आर्ट के प्रदर्शन के साथ रंग मिलते हैं. उत्तराखंड के कुमाऊँ में बैठकी और खड़ी होली होती है, जहां लोग पारंपरिक कपड़े पहनते हैं और लोकगीत और राग गाते हैं. हिमाचल में इसे फाग के नाम से जाना जाता है। ये रूप त्योहार में ऊर्जा और विविधता लाते हैं.

पूर्वी भारत में डोल और फगुवा

पश्चिम बंगाल में होली को डोल जात्रा या स्प्रिंग फेस्टिवल कहा जाता है. शांतिनिकेतन में जो रवींद्रनाथ टैगोर का तोहफ़ा है, इसे म्यूज़िक, डांस और राधा-कृष्ण की यात्रा के साथ मनाया जाता है. ओडिशा में डोला पूर्णिमा, बिहार और झारखंड में फगुवा या फगुवा, असम में फकुवा या दौल और मणिपुर में छह दिन का याओसांग त्योहार मनाया जाता है. ये इलाके होली को एक कल्चरल गहराई देते हैं, जिसमें लोक परंपराओं और जश्न को रंगों के साथ मिलाया जाता है.

पश्चिम और दक्षिण की अनोखी परंपरा

महाराष्ट्र में होली मुख्य त्योहार के पांचवें दिन रंग पंचमी तक चलती है. गोवा में शिग्मो नाम का एक बड़ा जुलूस होता है और लोक डांस होते हैं जो वसंत का स्वागत करते हैं. गुजरात में होलिका दहन के बाद धुलेटी होती है. केरल में कोंकणी समुदाय मंजल कुली या उकुली मनाता है, जिसमें रंगों की जगह हल्दी के पानी का इस्तेमाल किया जाता है. इन परंपराओं से पता चलता है कि दक्षिण में भी होली की अपनी अलग पहचान है, जहां प्राकृतिक रंग और स्थानीय रीति-रिवाजों का बोलबाला है.

होली का सार

चाहे लट्ठमार हो या फूलों, फगुआ हो या शिग्मो, होली हर जगह खुशी और प्यार का संदेश देती है. अलग-अलग नाम और तरीके भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को दिखाते हैं. इस साल 4 मार्च को रंगों में भीगने से पहले, इन परंपराओं को समझें और अपनाएं. परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर मनाएं, क्योंकि होली का असली रंग रिश्तों में ही है.

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