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मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में बॉम्बे HC के खिलाफ SC में अपील, बरी किए गए 12 दोषियों के लिए सजा की मांग तेज

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को 2015 की विशेष अदालत की सजा को पलट दिया. उस समय पांच लोगों को मौत की सजा और सात को उम्रकैद दी गई थी. हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष सबूत पेश करने में विफल रहा.

Calendar Last Updated : 22 July 2025, 11:42 AM IST
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Mumbai Train Blasts: महाराष्ट्र सरकार ने 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोटों के 12 दोषियों को बरी करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट 24 जुलाई को इस पर सुनवाई करेगा. इन विस्फोटों में 180 से ज्यादा लोग मारे गए थे.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को 2015 की विशेष अदालत की सजा को पलट दिया. उस समय पांच लोगों को मौत की सजा और सात को उम्रकैद दी गई थी. हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष सबूत पेश करने में विफल रहा. कोर्ट ने इकबालिया बयानों को यातना से लिया गया और अविश्वसनीय बताया. सभी अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश दिया गया.

हाईकोर्ट के फैसले से दंग

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हाईकोर्ट के फैसले को चौंकाने वाला बताया. उन्होंने कहा कि मैं पूरे आदेश का अध्ययन करूंगा. वकीलों से बात हो चुकी है. हम सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे. सरकार का मानना है कि यह मामला गंभीर है और इसे चुनौती देना जरूरी है. 11 जुलाई 2006 को मुंबई की उपनगरीय ट्रेनों में सात समन्वित विस्फोट हुए. यह हमला पश्चिमी रेलवे लाइन पर शाम के व्यस्त समय में हुआ. 180 से ज्यादा लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए. यह भारत के सबसे घातक आतंकी हमलों में से एक था. इसने देश में आक्रोश फैलाया.

सुप्रीम कोर्ट पर लोगों की उम्मीद

न्यायमूर्ति अनिल किलोर और श्याम चांडक की पीठ ने 671 पन्नों के फैसले में अभियोजन पक्ष की खामियां गिनाईं. कोर्ट ने कहा कि सबूतों में विश्वसनीयता नहीं थी. इकबालिया बयान नकल किए हुए और यातना से लिए गए थे. मकोका का गलत इस्तेमाल हुआ. गवाहों की जांच में भी चूक थी. पांच दोषियों में से एक, कमाल अंसारी, की 2021 में मृत्यु हो चुकी है. बाकी 11 अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश है, बशर्ते वे अन्य मामलों में हिरासत में न हों. इस फैसले ने पीड़ितों के परिवारों में निराशा पैदा की है. महाराष्ट्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना इस मामले में नया मोड़ ला सकता है. यह मामला न केवल कानूनी, बल्कि भावनात्मक रूप से भी संवेदनशील है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा कि क्या पीड़ितों को इंसाफ मिलेगा या नहीं. इस सुनवाई पर देश की नजरें टिकी हैं.

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