भारत में नौकरीपेशा लोगों के लिए एक बड़ी और सुखद खबर सामने आई है. केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए लेबर कोड, जिसे 'ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड 2020' (Labour Code 2025) के नाम से जाना जा रहा है, कर्मचारियों के अधिकारों को और अधिक मजबूत करने के लिए तैयार है. इस नए कानून का सबसे क्रांतिकारी पहलू छुट्टियों से जुड़ा है, जो विशेष रूप से नई नौकरी जॉइन करने वाले युवाओं के लिए वर्क-लाइफ बैलेंस की नई परिभाषा लिखेगा.
पुराने श्रम कानूनों के मुताबिक, किसी भी संस्थान में 'अर्न्ड लीव' का हकदार बनने के लिए कर्मचारी को कम से कम 240 दिन यानी करीब 8 महीने तक काम करना अनिवार्य होता था. लेकिन नए लेबर कोड में इस समय सीमा को घटाकर मात्र 180 दिन (6 महीने) कर दिया गया है. इसका सीधा मतलब यह है कि अब कर्मचारी अपनी ज्वाइनिंग के छह महीने बाद ही वैधानिक छुट्टियों का लाभ उठा सकेंगे, जिससे उन्हें साल के बीच में ही परिवार और निजी कार्यों के लिए राहत मिल जाएगी.
नए नियमों में न केवल छुट्टियां मिलना आसान हुआ है, बल्कि छुट्टियों की बर्बादी को रोकने का भी पुख्ता इंतजाम किया गया है. कानून के मुताबिक, अब कर्मचारी अपनी सालभर की अतिरिक्त या बची हुई छुट्टियों को बेकार जाने देने के बजाय उन्हें 'कैश' (Leave Encashment) करा सकेंगे. पहले कई राज्यों में ऐसी व्यवस्था थी कि तय सीमा से अधिक छुट्टियां होने पर वे अपने आप लैप्स हो जाती थीं, लेकिन अब कर्मचारी हर साल अपनी छुट्टियों के बदले आर्थिक लाभ ले सकेंगे.
अक्सर देखा जाता है कि कंपनियां वर्कलोड का हवाला देकर कर्मचारियों की छुट्टी की अर्जी खारिज कर देती हैं, जिससे उनकी छुट्टियां खत्म होने का डर बना रहता था. नए लेबर कोड में प्रावधान है कि अगर कंपनी कर्मचारी की छुट्टी मंजूर नहीं करती है, तो वे छुट्टियां खत्म नहीं होंगी. ऐसी छुट्टियों को बिना किसी ऊपरी सीमा के आगे के लिए 'कैरी फॉरवर्ड' किया जा सकेगा. यह नियम कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.
हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये सभी आकर्षक फायदे हर किसी के लिए नहीं हैं. यह नियम मुख्य रूप से उन 'वर्कर्स' के लिए तैयार किया गया है जिनकी मासिक सैलरी ₹18,000 तक है और जो गैर-मैनेजेरियल या गैर-एडमिनिस्ट्रेटिव पदों पर कार्यरत हैं. जो लोग सुपरवाइजरी या मैनेजमेंट पोजीशन में हैं और ₹18,000 से अधिक कमाते हैं, वे फिलहाल इन विशिष्ट प्रावधानों के दायरे में नहीं आएंगे.