नई दिल्ली: बच्चा गोद लेने वाले माता-पिता के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले लिया है. कोर्ट ने स्पष्ट कर किया है कि मातृत्व केवल जन्म तक सीमित नहीं है. भारत के उच्च न्यायालय ने कहा कि तीन महीने से ज्यादा उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश से वंचित करना असंवैधानिक होगा. इस फैसले को अडॉप्टिव मदर्स और बच्चों के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि मातृत्व संरक्षण का उद्देश्य इस बात से नहीं बदलता कि बच्चा मां के जीवन में कैसे आता है. चाहे बच्चा जन्म से हो या गोद लिया गया हो, दोनों ही स्थितियों में मां और बच्चे के बीच भावनात्मक और शारीरिक तालमेल की आवश्यकता समान होती है.
सुप्रीम कोर्ट ने कोड ऑफ सोशल स्क्योरिटि , 2020 की धारा 60 (4) में दी गई आयु सीमा पर आपत्ति जताई. इस प्रावधान के तहत केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को ही मातृत्व अवकाश का अधिकार दिया गया था. लेकिन अब अदालत ने कहा कि यह सीमा समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है.
The Supreme Court has ruled that Section 60(4) of the Code on Social Security, 2020, that allowed adoptive mothers to avail 12 weeks’ maternity leave only if the adopted child was below three-months of age is unconstitutional and violative of the Right to Equality.
— ANI (@ANI) March 17, 2026
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न्यायालय ने अपने फैसले में भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह का भेदभाव सही नहीं है. अदालत ने माना कि जैविक और गोद ली हुई मां के बीच अंतर हो सकता है, लेकिन इस आधार पर इन्हें सामाजिक सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता है.
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि परिवार बनाने के लिए गोद लेना एक पूरी तरह वैध और सम्मानजनक तरीका है. अदालत के अनुसार, बच्चा किसी भी तरह से ‘स्वाभाविक’ बच्चे से कम नहीं होता और यह प्रक्रिया माता-पिता बनने की भावना को उतनी ही गहराई से मजबूत करती है.