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नेपाल बाढ़ तबाही में मौतों की संख्या करीब 500 पहुंचा, कहा- 'विदेशी रेस्क्यू टीमों की जरूरत नहीं'

नेपाल-चीन सीमा के पास आई इस जल प्रलय में अब तक 469 लोगों की सांसें छिन चुकी हैं, जबकि सैकड़ों जिंदगियां मलबे और कीचड़ के नीचे दबी हैं।

Calendar Last Updated : 28 August 2026, 12:42 PM IST
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नई दिल्ली: भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आई अचानक बाढ़ ने नेपाल में मौत और तबाही का ऐसा खौफनाक मंजर ला दिया है, जिसे देखकर पूरी दुनिया सिहर उठी है। नेपाल-चीन सीमा के पास आई इस जल प्रलय में अब तक 469 लोगों की सांसें छिन चुकी हैं, जबकि सैकड़ों जिंदगियां मलबे और कीचड़ के नीचे दबी हैं। इस भीषण त्रासदी के बीच बालेन शाह के नेतृत्व वाली नेपाल सरकार ने एक बेहद अहम फैसला लिया है। सरकार ने साफ कर दिया है कि राहत और बचाव कार्य की कमान पूरी तरह से नेपाली सुरक्षा एजेंसियों के हाथों में ही रहेगी। दुनिया भर के कई देशों ने अपनी बचाव टीमें भेजने की पेशकश की थी, लेकिन नेपाल ने विनम्रता से यह कहते हुए इनकार कर दिया हैं।

2015 के भूकंप से लिया सबक, विदेशी टीमों की दरकार नहीं

इस महासंकट की घड़ी में भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे कई देशों ने नेपाल की ओर मदद का हाथ बढ़ाया था। भारत ने NDRF भेजने की अनुमति भी मांगी थी। 
विदेशी मामलों के मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया कि बचाव कार्यों के लिए किसी बाहरी देश की टीम की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले के पीछे साल 2015 के विनाशकारी भूकंप की कड़वी यादें जुड़ी हैं। उस वक्त विदेशी राहत टीमों की भारी भीड़ जमा हो जाने से बचाव कार्यों में भारी अव्यवस्था फैल गई थी। 

खौफनाक आंकड़े और विदेशियों की गुमशुदगी का दर्द

तबाही का दायरा इतना विशाल है कि आंकड़े डराने वाले हैं। नेपाल पुलिस के 4,348 जांबाज जवान दिन-रात मलबे को खंगाल रहे हैं। अब तक 1,545 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है, जिसमें रसुवा से 644, नुवाकोट से 898 और धाडिंग से तीन लोग शामिल हैं। हालांकि, चिंता की बात यह है कि करीब एक हजार लोग और 28 पुलिसकर्मी अब भी लापता हैं। 
मलबे में अपनों को तलाशने की इस जद्दोजहद में विदेशियों की संख्या भी कम नहीं है। 178 भारतीय, 65 अमेरिकी, 53 यूक्रेनी, 51 मलेशियाई, 35 ऑस्ट्रेलियाई, 33 ब्रिटिश और 25 कनाडाई नागरिकों के साथ-साथ करीब 100 चीनी नागरिक भी लापता बताए जा रहे हैं। अपनों से संपर्क टूटने का यह दर्द सरहदों के पार तक महसूस किया जा रहा है। दुनिया भर के कई देशों ने अपनी बचाव टीमें भेजने की पेशकश की थी, लेकिन नेपाल ने विनम्रता से यह कहते हुए इनकार कर दिया हैं।

खुद मोर्चे पर डटे नेपाली जवान

नेपाल ने विदेशी बचाव टीमों को भले ही मना कर दिया हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसने दुनिया से मुंह मोड़ लिया है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि मदद सिर्फ एक तय व्यवस्था के तहत आर्थिक रूप में आनी चाहिए ताकि बाद के पुनर्वास और पुनर्निर्माण कार्यों में गति लाई जा सके। इसी कड़ी में अमेरिका ने पांच लाख डॉलर की आर्थिक मदद का ऐलान किया है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जीवन रक्षक दवाएं और जरूरी आपातकालीन मेडिकल सामग्री भेजी है। विदेशी नागरिकों के परिवारों की परेशानी और बेचैनी को समझते हुए नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक विशेष इमरजेंसी कंट्रोल रूम भी स्थापित किया है। यह केंद्र बचाव कार्यों की सटीक जानकारी जुटाने के साथ ही प्रभावित विदेशियों को जरूरी मदद पहुंचाने के लिए पूरी मुस्तैदी से काम कर रहा है।

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