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11वीं सदी की चोलकालीन ताम्र पट्टिकाएं भारत को लौटा रहा नीदरलैंड, पीएम मोदी की मौजूदगी में हुआ ऐतिहासिक हस्तांतरण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान भारत को 11वीं सदी की दुर्लभ चोल ताम्रपट्टियां वापस मिल गईं. वर्षों से लंबित इस सांस्कृतिक विरासत की वापसी ने न सिर्फ भारत की ऐतिहासिक धरोहर को सम्मान दिलाया, बल्कि भारत-नीदरलैंड संबंधों में भी नई गर्मजोशी और भरोसे की मिसाल पेश की.

Calendar Last Updated : 17 May 2026, 11:08 AM IST
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नई दिल्ली:  नीदरलैंड ने शनिवार को 11वीं सदी की चोल वंश से जुड़ी ऐतिहासिक ताम्र पट्टिकाएं भारत को सौंप दीं. इस विशेष अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहे. इसे भारत और नीदरलैंड के बीच मजबूत होते सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों का अहम प्रतीक माना जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को संयुक्त अरब अमीरात में संक्षिप्त प्रवास के बाद अपने पांच देशों के दौरे के दूसरे चरण में नीदरलैंड पहुंचे थे. उनके इस दौरे में स्वीडन, नॉर्वे और इटली भी शामिल हैं. भारत लंबे समय से इन ऐतिहासिक ताम्र पट्टिकाओं की वापसी की मांग कर रहा था.

कब से जारी थी वापसी की कोशिश?

भारत साल 2012 से अनैमंगलम ताम्र पट्टिकाओं की वापसी के लिए प्रयास कर रहा था. नीदरलैंड में इन्हें लीडेन प्लेट्स के नाम से जाना जाता है. ये 21 ताम्र पट्टिकाएं चोल साम्राज्य के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेखों में गिनी जाती हैं और भारत के बाहर संरक्षित तमिल विरासत की प्रमुख धरोहरों में शामिल हैं.

राजा राजा चोल प्रथम के समय की हैं पट्टिकाएं

इन ताम्र पट्टिकाओं का संबंध राजा राजा चोल प्रथम के शासनकाल से माना जाता है. करीब 30 किलोग्राम वजन वाली इन पट्टिकाओं को चोल राजवंश की शाही मुहर वाले कांस्य के छल्ले से बांधा गया है. पट्टिकाएं दो हिस्सों में विभाजित हैं. एक भाग में संस्कृत भाषा में शिलालेख हैं, जबकि दूसरे भाग में तमिल भाषा का उपयोग किया गया है. राजा चोल प्रथम एक हिंदू सम्राट थे, जिन्होंने एक बौद्ध मठ के लिए राजस्व अनुदान प्रदान किया था.

राजेंद्र चोल प्रथम ने करवाया था ताम्र पट्टिकाओं पर अंकन

इतिहास के अनुसार, राजा राजा चोल प्रथम ने मूल आदेश मौखिक रूप से दिया था, जिसे पहले ताड़पत्रों पर लिखा गया. बाद में उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने इस अनुदान को स्थायी रूप से संरक्षित रखने के लिए तांबे की पट्टिकाओं पर खुदवाया. इन पट्टिकाओं को जोड़ने वाले कांस्य छल्ले पर राजेंद्र चोल की शाही मुहर अंकित है.

कैसे पहुंचीं नीदरलैंड?

इन ताम्र पट्टिकाओं को 1700 के दशक में फ्लोरेंटियस कैंपर नीदरलैंड लेकर गए थे. वह उस समय भारत में एक ईसाई मिशनरी समूह के साथ आए थे. जिस नागपट्टिनम शहर का उल्लेख इन पट्टिकाओं में मिलता है, वह उस दौर में डच नियंत्रण में था.

अंतरराष्ट्रीय समिति ने भारत के दावे को माना सही

ताम्र पट्टिकाओं की वापसी को लेकर अंतर-सरकारी समिति के 24वें सत्र में भारत के दावे को वैध माना गया. समिति ने नीदरलैंड को भारत के साथ सकारात्मक द्विपक्षीय बातचीत करने के लिए प्रोत्साहित किया था. इसके बाद नीदरलैंड ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान इन ऐतिहासिक पट्टिकाओं को भारत को लौटाने का फैसला लिया.

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