menu-icon
The Bharatvarsh News

ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए चीन के जरिए बड़ा प्रहार करने की तैयारी में अमेरिका, तेल कारोबार और बैंक बनेंगी निशाना

अमेरिका ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए उसकी तेल कमाई से जुड़े नेटवर्क को निशाना बनाने की तैयारी में है. इस रणनीति में चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियां और वित्तीय संस्थान भी अमेरिकी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं.

Calendar Last Updated : 17 August 2026, 10:48 AM IST
Share:

नई दिल्ली: ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति अब एक नए मोड़ पर पहुंचती दिख रही है. अमेरिका की नजर सिर्फ ईरान के तेल कारोबार पर नहीं, बल्कि उन चीनी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर भी है, जो प्रतिबंधों के बावजूद तेहरान के साथ कारोबार जारी रखे हुए हैं. ईरान के तेल कारोबार में चीन की भूमिका बेहद अहम है.  Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में ईरान से निर्यात किए गए तेल का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा चीन पहुंचा. अमेरिकी ट्रेजरी के अनुसार, यह हिस्सा करीब 90 प्रतिशत तक रहा है और चीनी स्वतंत्र रिफाइनरियां इस तेल की बड़ी खरीदार हैं. इन छोटी और निजी रिफाइनरियों को आम तौर पर ‘टीपॉट’ कहा जाता है.

टीपॉट रिफाइनरियां चीन की कुल रिफाइनिंग क्षमता का करीब एक चौथाई हिस्सा संभालती हैं. इनका कारोबार अक्सर कम मुनाफे पर चलता है और कई संयंत्र प्रतिबंधित देशों से मिलने वाले सस्ते कच्चे तेल पर निर्भर रहते हैं. ईरानी तेल पर अमेरिकी कार्रवाई बढ़ने से इन कंपनियों के लिए कच्चे माल की व्यवस्था और कारोबार दोनों मुश्किल हो सकते हैं. अप्रैल 2026 में अमेरिका ने चीन की बड़ी स्वतंत्र रिफाइनरी हेंगली पेट्रोकेमिकल को भी प्रतिबंधित किया था.

सेकेंडरी प्रतिबंधों का बढ़ सकता है खतरा

अमेरिका की अगली रणनीति उन संस्थाओं को निशाना बनाने की हो सकती है, जो सीधे ईरान की नहीं, बल्कि उसके साथ कारोबार करने वाली कंपनियों की मदद करती हैं. इसे सेकेंडरी प्रतिबंध कहा जाता है. इसका असर उन बैंकों, शिपिंग कंपनियों और कारोबारियों पर पड़ सकता है, जो ईरानी तेल से जुड़े लेनदेन में शामिल पाए जाते हैं.

अमेरिकी ट्रेजरी पहले ही वित्तीय संस्थानों को चीनी टीपॉट रिफाइनरियों के साथ कारोबार से जुड़े जोखिमों को लेकर चेतावनी दे चुका है. विभाग का कहना है कि ईरानी तेल के कारोबार में फ्रंट कंपनियों, बिचौलियों और तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ का इस्तेमाल किया जाता है. जहाजों की पहचान छिपाना, दस्तावेजों में बदलाव करना और समुद्र में जहाज से जहाज तक तेल पहुंचाना इसके कुछ तरीके बताए गए हैं.

चीनी बैंकों पर भी नजर

अमेरिकी दबाव का अगला केंद्र चीन के बड़े वित्तीय संस्थान भी हो सकते हैं. अमेरिकी अधिकारियों ने चीन और हांगकांग की कुछ संस्थाओं पर ईरानी तेल से जुड़े अरबों डॉलर के लेनदेन में मदद करने के आरोप लगाए हैं. यदि बड़े चीनी बैंक भी अमेरिकी प्रतिबंधों की चपेट में आते हैं, तो इसका असर केवल ईरान पर नहीं, बल्कि अमेरिका-चीन आर्थिक संबंधों पर भी पड़ सकता है. हालांकि, बीजिंग की ओर से जवाबी कदम की आशंका भी बनी हुई है. चीन पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध कर चुका है और उसने कुछ चीनी रिफाइनरियों पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों को मानने से इनकार किया है.

‘व्हैक-अ-मोल’ रणनीति कितनी कारगर

अमेरिका लंबे समय से ईरान की तेल कमाई रोकने के लिए कंपनियों, जहाजों और कारोबारियों पर प्रतिबंध लगा रहा है. लेकिन इस रणनीति की एक बड़ी चुनौती यह है कि एक संस्था पर कार्रवाई के बाद उसकी जगह दूसरी कंपनी या नया नेटवर्क सामने आ जाता है. प्रतिबंधों के विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान ने समय के साथ ऐसे नेटवर्क तैयार कर लिए हैं, जिनकी मदद से वह तेल बेचने और भुगतान हासिल करने के रास्ते खोज लेता है. इसलिए अमेरिकी कार्रवाई को ‘व्हैक-अ-मोल’ रणनीति से जोड़ा जा रहा है, जिसमें एक रास्ता बंद होने के बाद दूसरा रास्ता सामने आ जाता है.

तेल के अलावा एविएशन सेक्टर पर भी दबाव

अमेरिका ईरान की व्यापारिक क्षमता को कमजोर करने के लिए तेल के अलावा विमानन और दूसरे क्षेत्रों पर भी प्रतिबंध बढ़ा सकता है. इसका उद्देश्य ईरान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामान, पैसा और सेवाएं हासिल करना कठिन बनाना होगा. यह दबाव ऐसे समय बढ़ रहा है जब अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग पर भी कड़ा रुख अपनाया है. इस रास्ते से तेल की बड़ी मात्रा का वैश्विक कारोबार जुड़ा है. हाल के दिनों में यहां जहाजों की आवाजाही काफी धीमी हुई है, जिससे ऊर्जा बाजार पर भी असर पड़ा है.

जमीनी नाकेबंदी की चर्चा

ईरान पर दबाव बढ़ाने के विकल्पों में जमीनी स्तर पर उसकी सीमाओं को अधिक सख्ती से नियंत्रित करने की संभावना भी चर्चा में है. इसके लिए इराक, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान और आर्मेनिया जैसे पड़ोसी देशों का सहयोग जरूरी होगा. हालांकि, इस योजना को लागू करना आसान नहीं माना जा रहा. ईरान की कई सीमाएं पहाड़ी और कठिन इलाकों से होकर गुजरती हैं.

इसके अलावा पड़ोसी देशों की अपनी राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताएं हैं. ऐसी स्थिति में व्यापक जमीनी नाकेबंदी के लिए लंबे समय तक सहयोग बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी. इस तरह की कार्रवाई का सबसे सीधा असर ईरान के आम लोगों पर पड़ सकता है. यदि भोजन, ऊर्जा, कपड़े और अन्य जरूरी सामानों के आयात में बड़ी रुकावट आती है, तो देश के भीतर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राजनीतिक बदलाव की गारंटी नहीं मिलती और इसके उलटे मानवीय संकट की स्थिति गंभीर हो सकती है.

सेकेंडरी टैरिफ का विकल्प

ट्रंप प्रशासन उन देशों के खिलाफ टैरिफ लगाने की संभावना पर भी विचार कर सकता है, जो ईरान के साथ कारोबार जारी रखते हैं. इससे ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों और कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनाया जा सकता है. हालांकि, इस दिशा में भी कानूनी और राजनीतिक अड़चनें हैं. प्रस्तावित उपायों को लागू करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी जरूरी हो सकती है और इस मुद्दे पर डेमोक्रेट्स के साथ-साथ कुछ रिपब्लिकन नेताओं के बीच भी चिंता मौजूद है.

कुल मिलाकर, अमेरिका ईरान की कमाई के प्रमुख रास्तों को बंद करने के लिए एक साथ कई मोर्चों पर दबाव बढ़ाने की तैयारी में दिख रहा है. लेकिन चीन की भूमिका इस पूरी रणनीति को जटिल बनाती है. ईरानी तेल के सबसे बड़े खरीदार के रूप में चीन पर कार्रवाई से तेहरान को नुकसान पहुंच सकता है, लेकिन वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच आर्थिक और रणनीतिक तनाव भी  बढ़ सकता है.

सम्बंधित खबर

Recent News