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10 दिनों तक क्यों मनाई जाती है गणेश चतुर्दशी? जानें क्या है इसके पीछे का कारण

गणेश चतुर्थी की जड़ें प्राचीन हिंदू परंपराओं से जुड़ी हैं. पुराणों के अनुसार, भगवान गणेश की पूजा किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में की जाती है. 19वीं सदी में स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने इसे सामाजिक उत्सव का रूप दिया.

Calendar Last Updated : 20 August 2025, 12:22 PM IST
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Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी का त्योहार कुछ दिनों में शुरू हो जाएगा. यह पर्व भगवान गणेश के जन्म का उत्सव है, जिन्हें विघ्नहर्ता और समृद्धि का देवता माना जाता है. यह 10 दिन का उत्सव अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होगा. आइए जानते हैं इस त्योहार की कहानी, महत्व और उत्सव का तरीका.

गणेश चतुर्थी की जड़ें प्राचीन हिंदू परंपराओं से जुड़ी हैं. पुराणों के अनुसार, भगवान गणेश की पूजा किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में की जाती है. 19वीं सदी में स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने इसे सामाजिक उत्सव का रूप दिया. उनका मकसद था ब्रिटिश शासन के खिलाफ लोगों को एकजुट करना. तब से यह त्योहार भक्ति के साथ-साथ सामुदायिक एकता का प्रतीक बन गया है.

10 दिनों का उत्सव क्यों?  

हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान गणेश के जन्म के बाद 10 दिनों तक देवताओं और ऋषियों ने उनकी पूजा की. यह अवधि भक्ति, प्रार्थना और उत्सव का प्रतीक है. दसवें दिन मूर्ति विसर्जन होता है, जो यह सिखाता है कि जीवन में सब कुछ अस्थायी है. यह वैराग्य का संदेश देता है कि हर चीज को अपने मूल स्रोत में लौटना होता है. गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है. माना जाता है कि इस दौरान भगवान गणेश पृथ्वी पर आकर भक्तों को ज्ञान, समृद्धि और कठिनाइयों पर विजय का आशीर्वाद देते हैं. यह पर्व एकता, विनम्रता और आध्यात्मिक विकास का संदेश देता है. यह लोगों को आपसी भाईचारे और अनुशासन की भावना अपनाने के लिए प्रेरित करता है.

भारत में उत्सव का रंग  

गणेश चतुर्थी में घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणेश जी की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. भक्त मिठाई, फूल और मोदक चढ़ाते हैं. भजन, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से माहौल भक्तिमय हो जाता है. खासकर महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में यह त्योहार बड़े पैमाने पर मनाया जाता है. दसवें दिन भव्य जुलूस के साथ मूर्तियों का जल में विसर्जन किया जाता है. यह भगवान गणेश की कैलाश पर्वत की वापसी का प्रतीक है. जुलूस में नाच-गाना, ढोल-नगाड़े और भक्ति का अनोखा संगम देखने को मिलता है. यह दृश्य आस्था और उत्साह का अनूठा मेल होता है.

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