मुंबई में ठाकरे मिलन बेअसर, BMC पर BJP–शिंदे की पकड़ मजबूत

महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों ने सिर्फ स्थानीय सत्ता का फैसला नहीं किया, बल्कि राज्य की दो सबसे प्रभावशाली राजनीतिक विरासतों ठाकरे और पवार के भविष्य पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

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मुंबई/पुणे: महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों ने सिर्फ स्थानीय सत्ता का फैसला नहीं किया, बल्कि राज्य की दो सबसे प्रभावशाली राजनीतिक विरासतों ठाकरे और पवार के भविष्य पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

मुंबई और पुणे जैसे पारंपरिक गढ़ों में आए नतीजों ने संकेत दे दिया है कि पारिवारिक मेल-मिलाप अब वोट में बदलने की गारंटी नहीं रहा.

उद्धव और राज आए साथ

इस चुनाव का केंद्र बिंदु मुंबई रहा, जहां करीब दो दशक बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक मंच पर आए. उम्मीद थी कि ठाकरे परिवार का यह मेल-मिलाप बृहन्मुंबई नगर निगम में हिंदुत्व ब्रिगेड को चुनौती देगा. वहीं मतगणना के रुझानों ने साफ कर दिया कि यह प्रयोग जमीन पर असर नहीं छोड़ सका.

शिवसेना के हाथ से गई मुंबई

25 साल तक अविभाजित शिवसेना के कब्जे में रही BMC अब भाजपा और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना की ओर झुक गई. 2022 के विभाजन के बाद पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को मिला और उसी का फायदा अब नगर निगम स्तर पर भी दिख रहा है.

हिंदुत्व की विरासत की जंग

एकनाथ शिंदे खुद को बाल ठाकरे की आक्रामक हिंदुत्व विरासत का असली उत्तराधिकारी बताते रहे हैं. उनका आरोप रहा है कि उद्धव ठाकरे कांग्रेस और शरद पवार की NCP के साथ गठबंधन कर शिवसेना की मूल विचारधारा से भटक गए. यही तर्क 2022 में सत्ता परिवर्तन की बुनियाद बना.

दूसरी ओर, राज ठाकरे और उनकी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने मराठी मानुष और प्रवासी विरोधी राजनीति के जरिए पुराने बाल ठाकरे के तेवर लौटाने की कोशिश की. दक्षिण भारतीयों पर विवादित टिप्पणियों से उन्होंने सुर्खियां तो बटोरीं, लेकिन वोटों में यह आक्रामकता नहीं बदल सकी.

ठाकरे खेमे के सामने बड़ा सवाल

नतीजों ने उद्धव और राज दोनों के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है. भाजपा के हिंदुत्व को वे चाहे “नकली” कहें, लेकिन संख्या बल की कमी अब उनकी राजनीति को सीमित कर रही है. ऐसे में उन्हें तय करना होगा कि उनकी सेनाओं की कोर आइडियोलॉजी आखिर है क्या सॉफ्ट पॉलिटिक्स या आक्रामक पहचान की राजनीति.

पुणे से पवार परिवार के लिए भी खतरे की घंटी

पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में NCP के दोनों गुटों शरद पवार और अजित पवार की सुलह भी खास असर नहीं दिखा सकी. 2023 में चाचा-भतीजे के विभाजन के बाद यह समझौता अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा था, लेकिन नतीजों ने संकेत दिया कि पवार ब्रांड की पकड़ भी कमजोर पड़ रही है.

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