नई दिल्ली: होली का पर्व लोगों के लिए खुशहाली का महोत्सव रहता है. हर साल कई लोग इस दिन अपने प्रियजनों को रंग लगाकर और पानी से भिगाकर चेहरों पर मुस्कान लाते हैं. हर साल होली के दिन छोटे से लेकर बड़े लोग रंगों में घूल जाते हैं. वहीं एक प्रश्न लोगों को परेशान भी करता है. होली कब है, इसको लेकर हर जगह तीखी बहस छिड़ गई है. अब, कैलेंडर ने इस कंफ्यूजन को पूरी तरह से दूर कर दिया है.
हिंदू कैलेंडर के मुताबिक, फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन रंगों वाली होली खेली जाती है. धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह त्योहार सामाजिक मेलजोल और भाईचारे का संदेश भी देता है. आइए जानें होली 2026 की सही तारीख और इससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में.
वैदिक कैलेंडर के अनुसार, होलिका दहन फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन 3 मार्च को किया जाएगा. रंगों की होली अगले दिन 4 मार्च को मनाई जाएगी. पारंपरिक रूप से बुराई की निशानी होलिका को पहले दिन जलाया जाता है. दूसरे दिन लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर खुशियां बांटते हैं. यह रस्म हर साल निभाई जाती है.
होली भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकश्यप और होलिका की मशहूर कहानी से जुड़ी है. माना जाता है कि घमंडी राजा हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे प्रह्लाद को भगवान विष्णु की पूजा करने से रोकने की कोशिश की थी. आखिर में प्रह्लाद को लेकर होलिका आग में बैठ गई, लेकिन अपने वरदान का गलत इस्तेमाल करके वह खुद जल गई. आग से प्रह्लाद को कोई नुकसान नहीं हुआ. इसी याद में होलिका दहन मनाया जाता है.
भारत के अलग-अलग इलाकों में होली को अलग-अलग नामों से जाना जाता है. कुछ जगहों पर इसे होरी और डोलयात्रा कहते हैं, तो कुछ जगहों पर इसे कामदहन और शिमगा के नाम से मनाया जाता है. कोंकण और गोवा में इसे शिग्मो के नाम से जाना जाता है, जबकि बंगाल में इसे डोल पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. ब्रज क्षेत्र में फूलों की होली और लट्ठमार होली खास तौर पर आकर्षक होती है.
होली सिर्फ रंगों से खेलने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता का भी प्रतीक है. इस दिन लोग पुराने मतभेद भुलाकर गले मिलते हैं और रिश्तों में मिठास भरते हैं. आध्यात्मिक रूप से यह त्योहार अहंकार और नफरत को छोड़ने का संदेश देता है. इसलिए होली को आध्यात्मिक शुद्धि और पॉजिटिव एनर्जी का त्योहार भी कहा जाता है.