दिल्ली उच्च न्यायालय ने पतंजलि के विज्ञापनों पर लगाई रोक, डाबर के हित में फैसला

डाबर ने पतंजलि पर गलत दावे करने का आरोप लगाया. डाबर के वकील संदीप सेठी ने बताया कि पतंजलि ने अपने च्यवनप्राश को 51 जड़ी-बूटियों से बना बताया, जबकि इसमें केवल 47 जड़ी-बूटियां हैं . उन्होंने यह भी कहा कि पतंजलि के उत्पाद में पारा है, जो बच्चों के लिए हानिकारक है.

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Courtesy: Social Media

Patanjali: दिल्ली उच्च न्यायालय ने पतंजलि को डाबर च्यवनप्राश के खिलाफ अपमानजनक विज्ञापन प्रकाशित करने से रोक दिया. न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की पीठ ने डाबर की अंतरिम राहत की मांग को स्वीकार किया . अदालत ने कहा कि आवेदन मंजूर है. इस मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को रखी गई है . यह फैसला डाबर इंडिया की याचिका के जवाब में आया, जिसमें पतंजलि के टीवी विज्ञापनों पर सवाल उठाए गए थे. 

सेठी ने तर्क दिया कि पतंजलि ने डाबर के 40 जड़ी-बूटियों वाले च्यवनप्राश को "साधारण" कहकर उसकी विश्वसनीयता को ठेस पहुंचाई. डाबर का कहना है कि यह अपमानजनक है. 

पतंजलि को नोटिस जारी

पतंजलि के वकील जयंत मेहता ने इन आरोपों का खंडन किया . उन्होंने कहा कि पतंजलि का च्यवनप्राश आयुर्वेदिक मानकों का पालन करता है. मेहता ने दावा किया कि उत्पाद में सभी तत्व सुरक्षित हैं और मानव उपभोग के लिए उपयुक्त हैं. उन्होंने डाबर के आरोपों को गलत बताया और कहा कि पतंजलि के विज्ञापन सत्य पर आधारित हैं. यह विवाद पिछले साल दिसंबर में शुरू हुआ, जब डाबर ने पतंजलि के विज्ञापनों के खिलाफ याचिका दायर की. डाबर ने कहा कि पतंजलि ने एक सप्ताह में 6,182 विज्ञापन प्रसारित किए, जो उनकी साख को नुकसान पहुंचाते हैं. अदालत ने तब पतंजलि को समन और नोटिस जारी किया था. डाबर ने यह भी आपत्ति जताई कि पतंजलि ने दावा किया कि केवल आयुर्वेदिक और वैदिक ज्ञान वाले ही प्रामाणिक च्यवनप्राश बना सकते हैं. डाबर ने इसे अपनी विश्वसनीयता पर हमला बताया. 

मार्केट में डाबर का दबदबा

डाबर च्यवनप्राश बाजार में 61.6% हिस्सेदारी के साथ अग्रणी है. कंपनी का कहना है कि पतंजलि के विज्ञापन उनकी साख को कमजोर करते हैं. डाबर ने कहा कि पतंजलि हमें साधारण कहकर बाजार के नेता को नीचा दिखा रहा है. इस विवाद ने च्यवनप्राश बाजार में दोनों कंपनियों के बीच तनाव को उजागर किया है. दिल्ली उच्च न्यायालय का यह फैसला डाबर के लिए बड़ी राहत है. पतंजलि को अब अपमानजनक विज्ञापन प्रसारित करने से बचना होगा. 14 जुलाई की सुनवाई में इस मामले पर और चर्चा होगी. यह विवाद न केवल दो कंपनियों के बीच की लड़ाई है, बल्कि यह बाजार में नैतिक विज्ञापन और उपभोक्ता विश्वास का सवाल भी उठाता है. 

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