नई दिल्ली: मकर संक्रांति पर पूरे देश में खुशी का माहौल रहा. सभी राज्यों में इस त्योहार को अपने परंपरा मुताबिक मनाया गया. लेकिन आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिले में इस त्योहार को और भी ज्यादा खास बनाने के लिए मुर्गा लड़ाई का आयोजन किया गया. जिसकी चर्चा पूरे जिले में हुई.
मुर्गा लड़ाई के दौरान राजामुंद्री निवासी रमेश ने ताडेपल्लीगुडेम कस्बे में आयोजित मुकाबले में 1.53 करोड़ रुपये की भारी रकम जीत ली. उनकी इस जीत ने उनके त्योहार को और भी ज्यादा खास बना दिया. इस जीत को सीजन का सबसे बड़ा दांव माना जा रहा है.
रमेश ने गुडीवाड़ा के प्रभाकर के मुर्गे के खिलाफ दांव लगाया था. दोनों मुर्गों के पैरों में चाकू बंधे थे. रमेश का विशेष नस्ल का मुर्गा विजयी रहा, जिससे वह रातों-रात करोड़पति बन गया. खुशी से झूमते हुए रमेश ने बताया कि उसने अपने मुर्गे को छह महीने तक सूखे मेवे खिलाकर तैयार किया था, ताकि वह लड़ाई में पूरी ताकत दिखा सके. स्थानीय टीवी चैनलों पर उनके जश्न के वीडियो वायरल हो गए. यह मुकाबला संक्रांति के दूसरे दिन आयोजित किया गया. राज्य के कई जिलों में दो दिनों से बड़े पैमाने पर मुर्गा लड़ाइयां हो रही हैं, जहां लाखों-करोड़ों का सट्टा लग रहा है. हालांकि कानूनी रूप से इस तरह की प्रतियोगिताओं पर प्रतिबंध हैं लेकिन अक्सर त्योहार पर ऐसी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता रहा है.
मुर्गा लड़ाई और इससे जुड़ा जुआ पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 और आंध्र प्रदेश गेमिंग एक्ट के तहत आता है, जिसकी वजह से इस पर पूरी तरह बैन है. जानवरों के अधिकार संगठन इसे क्रूरता का मामला बताते हैं, क्योंकि मुर्गों के पैरों में चाकू बांधना और लड़ाई करवाना गैरकानूनी है. कुछ आयोजक दावा करते हैं कि यह सिर्फ परंपरा है और सट्टेबाजी नहीं होती, लेकिन हकीकत में भारी जुआ चलता है. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई फैसलों के बावजूद यह प्रथा संक्रांति पर जोर-शोर से जारी रहती है. ग्रामीण इलाकों में इसे सांस्कृतिक उत्सव का हिस्सा माना जाता है. वहीं असम में भैंसों की लड़ाई भी आयोजित की जाती है. असम में माघ बिहू उत्सव के दौरान इसका आयोजन किया जाता है. लोग इसे अपनी परंपरा से जोड़ते हैं.