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Rakshabandhan: रक्षाबंधन की विशेष ऐतिहासिक कहानी, मुगल सम्राट का रक्षाबंधन

Rakshabandhan: पूरे देश में रक्षाबंधन पर्व को लेकर धूम दिखाई दे रही है. हर किसी को इस त्योहार का इंतजार था. ये त्योहार हर साल सावन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इस दिन बहनें भाइयों को राखी बांधती हैं. यदपि इस साल 30-31 अगस्त को रक्षाबंधन देश के कई हिस्सों में मनाया […]

Calendar Last Updated : 30 August 2023, 09:51 AM IST
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Rakshabandhan: पूरे देश में रक्षाबंधन पर्व को लेकर धूम दिखाई दे रही है. हर किसी को इस त्योहार का इंतजार था. ये त्योहार हर साल सावन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इस दिन बहनें भाइयों को राखी बांधती हैं. यदपि इस साल 30-31 अगस्त को रक्षाबंधन देश के कई हिस्सों में मनाया जा रहा है. इस त्योहार के शुभ अवसर पर पौराणिक कहानियां हम आपको बताने वाले हैं. रक्षाबंधन के पीछे काफी मशहूर मुगल शासक से जुड़ी एक महान गाथा है.

मुगल शासक की कहानी

हिंदू धर्म के इस पावन पर्व का इतिहास एक मुगल शासक की कहानी से जुड़ा हुआ है. रानी कर्णावती व मुगल सम्राट हुमायूं के बारे में बताया जाता है कि कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजी थी. जिसके बाद रक्षाबंधन की शुरूआत हो गई. रानी ने मुगल को राखी भेज कर सहायता करने की गुहार लगाई थी. वहीं हुमायूं ने भी कर्णावती की मदद करने का निर्णय लिया था.

विधवा रानी की कहनी

आपरको बता दें कि राणा संग्राम सिंह की विधवा रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट को उस समय राखी भेजी थी. जब गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया था. उस दरमियान रानी का बेटा चित्तौड़ की गद्दी पर बैठा था. यदपि रानी के बेटे के पास इतना सैनिक नहीं था कि वह अपना रियासत बचा सके. इस हालात में कर्णावती ने हुमायूं को सहयता की उम्मीद से राखी भेजी, जिसे सम्राट ने कबूल कर मदद करने का निर्णय लिया.

हुमायूं की विशाल सेना

रानी कर्णावती की गुहार सुनकर हुमायूं अपनी सेना के साथ चित्तौड़ के लिए चल पड़े. वहीं रास्ता लंबा होने के कारण पहुंचने में देरी हो गई. हुमायूं के जाते-जाते रानी कर्णावती आग में कूदकर जान दे चुकी थी. इस घटना के बारे में जानकर हुमायूं को बहुत गुस्सा आया और उसने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया. जिसपर बहादुर शाह ने रानी कर्णावती को हराकर अपना कब्जा कर लिया था. हुमायूं व बहादुर शाह के बीच हुए युद्ध में हुमायूं को जीत प्राप्त हुई. इसके बाद राजा ने रानी कर्णावती के बेटे विक्रमजीत सिंह को दोबारा चित्तौड़ का शासन सौंप कर बहन कर्णावती का मान रखा. ये भाई-बहन का महान रिश्ता हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया है.

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