प्रयागराज: प्रयागराज माघ मेला अब अंतिम पड़ाव पर है. माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन शंकाराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को संगम में स्नान नहीं करने दिया गया, उसके बाद यूपी में बड़ा सियासी बवाल शुरू हो गया है. इस घटना के बाद वह संगम की धरती से बिना स्नान किए ही लौट गए थे. लेकिन अब काशी से उनके संत समागम व धर्म संसद के ऐलान ने इस मुद्दे को और तीखा बना दिया है.
शंकराचार्य के बयानों और अल्टीमेटम के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है. इसके बाद उन्होंने ऐलान किया कि महाशिवरात्रि से पहले 10-11 मार्च को लखनऊ में धर्म संसद आयोजित की जाएगी, जिसमें देशभर के संत-महंत जुटेंगे और अहम निर्णय लिए जाएंगे.
शंकराचार्य ने मीडिया से बातचीत में कहा कि लखनऊ में होने वाली बैठक में यह तय किया जाएगा कि 'कौन हिंदू है, कौन हिंदू हृदय सम्राट है और किसे नकली हिंदू कहा जाना चाहिए.' उनके इस बयान से विवाद सुलझने के बजाय और गहराता नजर आ रहा है.
मीडिया से बातचीत में शंकराचार्य ने दावा किया कि सनातन धर्म उनके साथ खड़ा है. उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 40 दिन का समय देते हुए कहा कि यदि उत्तर प्रदेश से गोमांस की आपूर्ति रोकी जाती है, तभी उन्हें 'हिंदू होने का प्रमाण' माना जाएगा. उनका कहना है कि यदि तय समय में यह नहीं हुआ, तो संत लखनऊ में एकत्र होकर निंदा करेंगे.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि देश के हिंदुओं के साथ बड़ा छल हो रहा है और इसके लिए खुद को साधु-संत कहने वाले लोग और उनकी राजनीति पार्टी जिम्मेदार है. उन्होंने कहा कि अब ऐसे लोगों का पर्दाफाश किया जाएगा. साथ ही उन्होंने आगे यह भी कहा कि दुनियाभर में आपके यहां से सप्लाई किया गोमांस बिक रहा. इसे 40 दिनों में रोकना होगा. हम तभी मानेंगे की आप हिंदू हैं. अगर ये सब कुछ 40 दिनों में बंद नहीं हुआ तो निर्धारित अवधि के बाद लखनऊ में संतो को बुलाया है. यहीं संत तय करेंगे कि योगी हिंदू हैं या नहीं.
शंकराचार्य के बयान पर संत समाज एकजुट नहीं दिखा. स्वामी नारायणाचार्य और अनंत श्याम देवाचार्य ने उनके बयान पर आपत्ति जताई और योगी आदित्यनाथ को हिंदुत्व का प्रतीक बताया. वहीं मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने सवाल उठाया कि क्या शंकराचार्य सभी हिंदुओं के ठेकेदार हैं.
माघ मेला छोड़ने को लेकर शंकराचार्य ने कहा कि प्रशासन ने उन्हें प्रोटोकॉल और सम्मान का लालच दिया, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। उनका कहना है कि पहले उन संन्यासियों से माफी मांगी जानी चाहिए, जिन पर लाठीचार्ज हुआ था. यह पूरा विवाद अब धार्मिक आस्था, सत्ता और राजनीति के टकराव का प्रतीक बन गया है.