सावरकर को भारत रत्न मिलने से बढ़ेगी भारत रत्न की शोभा! RSS चीफ भागवत का बड़ा बयान 'वे पहले से दिलों में बसे हैं'

मुंबई में रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का बयान एक बार फिर सियासी और वैचारिक चर्चाओं का केंद्र बिंदु बन गया है. भागवत ने कहा कि सावरकर को भारत रत्न देने से खुद पुरस्कार की शोभा बढ़ा देगा.

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Courtesy: ANI

मुंबई: मुंबई में रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का बयान एक बार फिर सियासी और वैचारिक चर्चाओं का केंद्र बिंदु बन गया है. उन्होंने कहा कि अगर वीर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो सावरकर से ज्यादा खुद सर्वोच्च नागरिक सम्मान की प्रतिष्ठा और बढ़ जाएगी. भागवत ने अपने शब्दों में कहा कि सावरकर को किसी भी पदक या सम्मान की जरूरत नहीं, वे पहले ही जनमानस में स्थापित हैं.

यह टिप्पणी उन्होंने मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम 'संघ की 100 साल की यात्रा- नए क्षितिज' के दौरान दी. इस मंच से उन्होंने सावरकर, संघ की कार्यशैली और भाषा को लेकर संगठन के दृष्टिकोण पर खुलकर बात की.

खुद सम्मान की गरिमा बढ़ेगी- भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का बयान इन दिनों खूब चर्चा में है. दरअसल उनका मानना है कि सावरकर को भारत रत्न मिलने में कथित तौर पर देरी हो रही है. इसके साथ ही उन्होंने आगे यह भी कहा कि सावरतर को पुरस्कार मिलने से उनकी शोभा नहीं बल्कि भारत रत्न की शोभा बढ़ेगी. क्योंकि बिना किसी औपचारिक सम्मान के भी वे लोगों के दिलों में बसे हुए हैं.

लंबे समय से जारी राजनीतिक बहस

दरअसल सावरकर को भारत रत्न देने की मांग लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रही है. जहां भाजपा और शिवसेना उनके स्वतंत्रता संग्राम, लेखन और समाज सुधारक के योगदान को आधार बनाकर इस सम्मान की वकालत करती रही हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी उनके दया पत्रों को लेकर इस मांग का विरोध करती आई है. इस कारण सत्ता पक्ष और विपक्ष में अकसर विवाद चला है. 

संघ का संगठनात्मक दर्शन

भागवत ने अपने संबोधन में आरएसएस की कार्यशैली पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि संघ आक्रामक प्रचार की बजाय संस्कार और मूल्यों के निर्माण पर विश्वास करता है. उनके अनुसार, जरूर से ज्यादा प्रचार से अहंकार जन्म ले सकता है, इसलिए प्रचार संतुलित और समयानुकूल होना चाहिए.

भाषा को लेकर संघ का नजरिया

इसके बाद भागवत ने भाषा के सवाल पर जवाब देते हुए कहा कि आरएसएस अपने आंतरिक कामकाज में अंग्रेजी को मुख्य माध्यम नहीं बनाएगा, क्योंकि यह स्वदेशी भाषा नहीं है. हालांकि, जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी के प्रयोग से परहेज भी नहीं है.

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